जीवन बड़ा विचित्र हिसाब रखता है। एक समय था जब आपकी जेब इतनी अनुमति नहीं देती थी कि मनपसंद और अच्छा भोजन खरीद सकूँ। शायद 1995-1996 की बात है जब स्कूल के बाहर एक फालूदा कुल्फी वाला बैठता ₹10 में भी लेने के लिए कई दिन तक ₹1 बचाकर वो खा पाते थे | . जो सस्ता था, वही खा लिया। समोसा सस्ता है, फल महँगा है—समोसा सही। पराठे से पेट भर रहा है—सूखे मेवे कौन खरीदे? कोल्ड ड्रिंक \ बिस्कुट में काम चल रहा है—पोषण का हिसाब बाद में देखेंगे। और शरीर भी जवान था। जो डालो, सह लेता था। मीठा खा लिया। तला हुआ खा लिया। रात को देर से खा लिया। कभी बहुत खाया, कभी भूखे रहे। फिर भी अगले दिन शरीर ऐसे उठ खड़ा होता था जैसे कल कुछ हुआ ही नहीं। युवा अवस्था की सबसे बड़ी भूल शायद यही है— शरीर बहुत कुछ सह लेता है, इसलिए हम समझ लेते हैं कि उसे कुछ हो ही नहीं रहा। जबकि शरीर भूलता नहीं है। बीस-पच्चीस की उम्र में जो अत्याचार हम उस पर करते हैं, चालीस के बाद वही शरीर धीरे-धीरे उनका हिसाब माँगना शुरू कर देता है। तब पता चलता है— जिस पेट को हम कूड़ेदान समझकर कुछ भी डालते रहे, उसकी भी स्मरणशक्ति थी। जिस नींद को काटकर काम कि...
बचपन की छोटी-सी ऋतु बच्चों का बचपन बड़ा विचित्र होता है। जब चल रहा होता है तो लगता है कि बहुत लंबा है। घर में खिलौने बिखरे हैं। हर थोड़ी देर में—“पापा सुनो ना…” “मम्मी देखो ना…” खाना नहीं खाना। सोना नहीं है। सौ प्रश्न पूछने हैं। और हम सोचते हैं— थोड़ा बड़ा हो जाए तो कुछ चैन मिले। मिलेगा। लेकिन शायद तब पता चलेगा कि जिस शोर से चैन माँग रहे थे, वही घर की सबसे सुंदर ध्वनि थी। बच्चे हमारे बच्चे पूरे जीवन रहते हैं, लेकिन बच्चे बनकर बहुत थोड़े वर्ष रहते हैं। एक दिन खिलौने कम होने लगेंगे। फिर गोद में बैठना बंद। फिर उंगली पकड़कर चलना बंद। फिर विद्यालय के द्वार पर कहेगा— “आप यहीं छोड़ दो, मैं चला जाऊँगा।” और कुछ वर्षों बाद— “आपको आने की आवश्यकता नहीं है।” यह सब किसी घोषणा के साथ नहीं होता। बस धीरे-धीरे होता है। और जब तक हमें पता चलता है कि बचपन जा रहा है, तब तक वह काफी दूर निकल चुका होता है। लेकिन हमें उसे बड़ा करने की इतनी जल्दी क्यों है? आज के माता-पिता को देखकर कई बार लगता है कि हम माता-पिता कम और फल के व्यापारी अधिक हो गए हैं। कच्चा फल सामने रखा है और चिंता यह है कि जल्दी पक क्यों नहीं...