प्रेम का कारण नहीं होता !
प्रेम का आधार कारण नहीं, साथ निभाना है यदि कोई तुमसे प्रेम करता है और इसलिए तुम भी उससे प्रेम करते हो, तो वह अपनापन है। यदि किसी के रूप को देखकर प्रेम हो जाए, तो वह आकर्षण है। यदि किसी के धन, पद या सुख-सुविधाओं के कारण प्रेम हो, तो वह लाभ की भावना है। यदि किसी के अच्छे स्वभाव और सरल व्यवहार के कारण प्रेम हो, तो वह सम्मान है। लेकिन यदि तुम स्वयं यह न बता सको कि तुम उससे प्रेम क्यों करते हो, यदि उसकी कमियाँ भी तुम्हें उससे दूर न कर सकें, यदि उसकी प्रसन्नता में तुम्हें प्रसन्नता मिले और उसके दुःख में तुम्हारा मन भी भर आए, तो वही सच्चा प्रेम है। क्योंकि सच्चा प्रेम किसी कारण से नहीं, मन के जुड़ाव और साथ निभाने से जन्म लेता है। भारत में एक समय ऐसा था जब माता-पिता अपने बच्चों का विवाह तय करते थे। गाँवों में नाई भी परिवारों को अच्छी तरह जानता था। वह केवल संदेश पहुँचाने वाला नहीं होता था, बल्कि परिवारों को जोड़ने का काम भी करता था। उसके बताए हुए अनेक संबंध जीवन भर चलते थे। उस समय अधिकतर युवक और युवती अपने जीवनसाथी से विवाह के बाद ही परिचित होते थे। वे साथ रहते-रहते एक-दूसरे को समझते थे...