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मुफ़्त की आदत केवल जनता को नहीं लगती

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  मुफ़्त की आदत केवल जनता को नहीं लगती पहली बार आप किसी को कोई चीज़ मुफ़्त में देते हैं तो उसके मन में आपके प्रति आभार पैदा होता है। दूसरी बार वही चीज़ मिले तो अगली बार उसकी प्रतीक्षा होने लगती है। तीसरी बार वह उसे अपना अधिकार समझने लगता है। चौथी बार अधिकार और पक्का हो जाता है। पाँचवीं बार वह सुविधा आदत बन जाती है। और छठी बार अगर वही चीज़ न मिले तो पहले पाँच बार के लिए धन्यवाद नहीं निकलता। सवाल निकलता है— इस बार क्यों नहीं मिला? यही मुफ्त की सबसे बड़ी समस्या है। धीरे-धीरे पाने वाला भूल जाता है कि जो उसे मुफ्त मिल रहा है, उसकी कीमत कोई न कोई चुका रहा है। अब यही बात राजनीति पर लगाकर देखिए। हमारे नेता अक्सर जनता को समझाते हैं— Freebie Culture देश के लिए अच्छा नहीं है। बिल्कुल सही। मुफ्त की आदत किसी के लिए अच्छी नहीं है। लेकिन फिर एक छोटा-सा सवाल है— यह नियम केवल जनता के लिए है क्या? जरा नेताओं को मिलने वाली सुविधाओं का हिसाब भी देख लेते हैं। एक सामान्य MLA लगभग ₹1.60 लाख महीना salary और allowances का पात्र है। इसके अतिरिक्त उसके Secretary के लिए ₹20,000 महीना और Driver के लिए ₹20,000...

अरबपति होकर भी लोन क्यों लेते है?

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  अरबपति होकर भी लोन क्यों लेते है? अरबपति होकर भी लोन क्यों लेते हैं? एक चीज़ मुझे समझ नहीं आती। जब अरबपतियों की संपत्ति पर कर लगाने की बात आती है तो तुरंत कहा जाता है कि उनके पास इतना पैसा होता कहाँ है? मान लो किसी आदमी की संपत्ति 300 अरब डॉलर बताई जा रही है। तो कहा जाएगा कि भाई उसके बैंक में 300 अरब डॉलर थोड़े ही पड़े हैं। उसके पास कंपनी के शेयर हैं। आज शेयर की कीमत इतनी है, कल गिर सकती है। उसने शेयर बेचे भी नहीं हैं। इसलिए यह असली कमाई नहीं है। ठीक है। यह बात मान लेते हैं। लेकिन फिर वही आदमी बैंक के पास जाता है। बैंक से कहता है कि मेरे पास इतने अरब डॉलर के शेयर हैं, इनके बदले मुझे कुछ अरब डॉलर उधार दे दो। और बैंक दे भी देता है। अब यहाँ मुझे थोड़ी दिक्कत होती है। कर देना हो तो शेयर पैसा नहीं हैं। लोन लेना हो तो वही शेयर पूरी संपत्ति हैं। ऐसा कैसे? मतलब सरकार पूछे तो कहेंगे— भाई मेरे पास पैसा कहाँ है? मैंने शेयर बेचे थोड़े ही हैं। और बैंक पूछे तो— देखो मेरे पास 300 अरब डॉलर हैं। 🙂 अब साधारण आदमी को देख लो। उसकी एक लाख रुपये तनख्वाह आई। उससे कोई नहीं पूछता कि आपने यह पैसा खर्च ...

प्रेम का कारण नहीं होता !

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  प्रेम का आधार कारण नहीं, साथ निभाना है यदि कोई तुमसे प्रेम करता है और इसलिए तुम भी उससे प्रेम करते हो, तो वह अपनापन है। यदि किसी के रूप को देखकर प्रेम हो जाए, तो वह आकर्षण है। यदि किसी के धन, पद या सुख-सुविधाओं के कारण प्रेम हो, तो वह लाभ की भावना है। यदि किसी के अच्छे स्वभाव और सरल व्यवहार के कारण प्रेम हो, तो वह सम्मान है। लेकिन यदि तुम स्वयं यह न बता सको कि तुम उससे प्रेम क्यों करते हो, यदि उसकी कमियाँ भी तुम्हें उससे दूर न कर सकें, यदि उसकी प्रसन्नता में तुम्हें प्रसन्नता मिले और उसके दुःख में तुम्हारा मन भी भर आए, तो वही सच्चा प्रेम है। क्योंकि सच्चा प्रेम किसी कारण से नहीं, मन के जुड़ाव और साथ निभाने से जन्म लेता है। भारत में एक समय ऐसा था जब माता-पिता अपने बच्चों का विवाह तय करते थे। गाँवों में नाई भी परिवारों को अच्छी तरह जानता था। वह केवल संदेश पहुँचाने वाला नहीं होता था, बल्कि परिवारों को जोड़ने का काम भी करता था। उसके बताए हुए अनेक संबंध जीवन भर चलते थे। उस समय अधिकतर युवक और युवती अपने जीवनसाथी से विवाह के बाद ही परिचित होते थे। वे साथ रहते-रहते एक-दूसरे को समझते थे...

18 वर्ष पहले की एक कार्टून फिल्म जो आज का सच दिखा गई!

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  आज किसी भी रेस्तराँ में बैठ जाइए। चार लोगों का परिवार मिलेगा। माँ सामने बैठी है, पिता उसके सामने। दो बच्चे साथ हैं। खाना भी आ चुका है। लेकिन मेज़ पर सबसे ज़्यादा बातचीत किससे हो रही है? मोबाइल से। बेटा रील देख रहा है। पिता समाचार पढ़ रहे हैं। माँ किसी समूह में संदेश भेज रही है। बेटी तस्वीर खींच रही है। चार लोग साथ बैठे हैं, पर चारों की दुनिया अलग-अलग है। यही दृश्य देखकर मुझे अचानक Pixar की फिल्म WALL·E याद आती है। लोग अक्सर कहते हैं कि यह पर्यावरण पर बनी फिल्म है। मुझे हमेशा लगता है कि यह फिल्म कचरे की नहीं, आदतों की कहानी है। फिल्म में पृथ्वी प्लास्टिक से भर जाती है। इंसान पृथ्वी छोड़कर अंतरिक्ष में चला जाता है। वहाँ उसके पास हर सुविधा है। चलने की ज़रूरत नहीं, सोचने की ज़रूरत नहीं, बस एक कुर्सी पर बैठे रहिए और स्क्रीन देखते रहिए। पहली बार जब मैंने यह फिल्म देखी थी, तब लगा था कि यह बहुत दूर के भविष्य की कल्पना है। आज दोबारा देखता हूँ तो लगता है, भविष्य हमारे दरवाज़े पर नहीं, हमारी जेब में रखा हुआ है। फ़र्क बस इतना है कि फिल्म में लोगों के हाथ में बड़ी स्क्रीन थी, हमारे हाथ में ...

पृथ्वी हमारी नहीं, हम पृथ्वी के हैं।

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पृथ्वी हमारी नहीं है... अरबों वर्षों तक यह पृथ्वी हमारे बिना भी पूर्ण थी। पहाड़ उठते रहे। नदियाँ अपना मार्ग बनाती रहीं। महासागर गहराते रहे। जंगल साँस लेते रहे। जीवन निरंतर नए रूपों में जन्म लेता रहा। यह सब तब भी हो रहा था, जब मनुष्य का अस्तित्व तक नहीं था। फिर हम आए। और पृथ्वी के अनंत इतिहास के एक क्षण भर में हमने स्वयं को इसका स्वामी घोषित कर दिया। हमने धरती पर सीमाएँ खींच दीं। किसी भूभाग का नाम "देश" रख दिया। नदियों को नक्शों की रेखाओं से बाँट दिया। जंगलों को संपत्ति बना दिया। ज़मीन के टुकड़ों पर अपने नाम लिख दिए। और फिर यह विश्वास भी कर लिया कि किसी कागज़ पर छपा हुआ स्वामित्व ही अंतिम सत्य है। लेकिन... प्रकृति ने उन कागज़ों पर कभी हस्ताक्षर नहीं किए। ऐसा कोई कानून नहीं जिसे हिमालय मानता हो। ऐसा कोई पासपोर्ट नहीं जिसे महासागर पहचानते हों। ऐसी कोई अदालत नहीं जिसके सामने जंगल हाज़िरी लगाते हों। ऋतुएँ किसी सरकार के आदेश से नहीं बदलतीं। हवा किसी संविधान के अनुसार नहीं बहती। बारिश किसी सीमा-रेखा को देखकर नहीं बरसती। सूरज किसी राष्ट्रध्वज को सलामी देकर नहीं उगता। और मृत्यु... वह ...

क्या Avatar फिल्म कहीं न कहीं ब्रिटिश भारत की याद दिलाती है?

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जब मैंने पहली बार 2009 में Avatar देखी थी, तो मुझे यह सिर्फ एक साइंस फिक्शन फिल्म लगी। लेकिन दूसरी बार देखने पर लगा कि यह कहानी सिर्फ एलियंस और दूसरी दुनिया की नहीं है। इसमें औपनिवेशिक शासन (Colonialism) की झलक साफ दिखाई देती है। अगर ब्रिटिश भारत का इतिहास पढ़ा हो, तो कई जगह ऐसा लगता है जैसे कहानी बस ग्रह बदलकर सुना दी गई हो। सबसे पहली बात देखिए। फिल्म में इंसान Pandora पर दोस्ती करने नहीं जाते। वे वहाँ इसलिए जाते हैं क्योंकि वहाँ Unobtanium नाम का कीमती संसाधन है। अब भारत को याद कीजिए। ईस्ट इंडिया कंपनी भी पहले यही कहकर आई थी कि हम तो सिर्फ व्यापार करने आए हैं। लेकिन धीरे-धीरे व्यापार, राजनीति में बदला… राजनीति, सेना में बदली… और देखते-देखते पूरा देश उनके कब्जे में चला गया। यही वजह है कि Avatar देखते समय RDA Corporation कई लोगों को East India Company जैसी लगती है। ⸻ एक और बात पर ध्यान दीजिए। फिल्म में Na’vi लोगों को बार-बार पिछड़ा, जंगली और असभ्य कहा जाता है। इतिहास में भी अंग्रेज़ अक्सर भारत के बारे में यही कहते थे कि यहाँ के लोग पिछड़े हैं और उन्हें सभ्य बनाने की ज़रूरत है। यह नहीं ...

हर वर्ष शिक्षा बजट में गिरावट क्यों? क्या है प्राथमिकता?

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अगर किसी देश को लंबे समय तक कमजोर करना हो... तो उसकी शिक्षा को कमजोर कर दीजिए। बाकी सब कुछ धीरे-धीरे अपने आप कमजोर होने लगता है। क्योंकि... सड़कें देश नहीं बनातीं। इमारतें देश नहीं बनातीं। हथियार देश नहीं बनाते। देश बनाते हैं उसके पढ़े-लिखे, जागरूक और कुशल नागरिक। पिछले कुछ दिनों से मैं भारत सरकार के बजट और शिक्षा से जुड़े आधिकारिक आँकड़े देख रहा था। जो तस्वीर सामने आई, उसने मुझे बेचैन कर दिया। पहला तथ्य कुल केंद्रीय बजट में शिक्षा मंत्रालय का हिस्सा 2004-05 – लगभग 2.8% 2005-06 – लगभग 3.0% 2006-07 – लगभग 3.2% 2007-08 – लगभग 3.3% 2008-09 – लगभग 3.4% 2009-10 – लगभग 3.7% 2010-11 – लगभग 3.9% 2011-12 – लगभग 4.0% 2012-13 – लगभग 4.2% 2013-14 – लगभग 4.6% ✅ (इस अवधि का सबसे अधिक) इसके बाद तस्वीर बदलने लगती है— 2014-15 – लगभग 4.1% 2015-16 – लगभग 3.8% 2016-17 – लगभग 3.7% 2017-18 – लगभग 3.6% 2018-19 – लगभग 3.5% 2019-20 – लगभग 3.3% 2020-21 – लगभग 3.2% 2021-22 – लगभग 3.1% 2022-23 – लगभग 2.9% 2023-24 – लगभग 2.7% 2024-25 – लगभग 2.6% 2025-26 – लगभग 2.5% 2026-27 – लगभग 2.6% अर्थात ... 2013-14 में कुल क...